Friday, May 22, 2009
जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार में ?
जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार में ?
जाने ना जाने ना, जग को खबर कब होगी ?
सूरत तेरी बड़ी है प्यारी अखियाँ हैं मतवाली
नज़र उतारूँ तेरी गुरूवर जाऊँ वारी वारी
हाय हाय जोगी रे.............
तेरा रूप है सबसे न्यारा तू सबका रखवाला
सबको नाच नचावे जोगी कैसा भोला भाला
हाय हाय जोगी रे.............
जब से मैंने तुमको देखा छूट गयी मनमानी
साँस साँस में नाम रटूँ तेरा हो गई मैं दीवानी
हाय हाय जोगी रे.............
मेरे दिलबर मेरे रहबर साथ सदा मेरे रहना
दूर न होना हमसे जोगी ऐसा तुमसे कहना
हाय हाय जोगी रे.............
तन मन में बस जाओ जोगी यह है मेरी मर्जी
इसको मेरा भाव समझ लो या समझो खुदगर्जी
हाय हाय जोगी रे.............
तुम ही तुम हो मेरे दिल में और कोई न रहता
मेरी साँसों की सरगम में तेरा नाम है रहता
हाय हाय जोगी रे.............
तेरे प्रेम में मैं बह जाऊँ मूरत मनवा बसाऊँ
तेरा सुमिरन करके जोगी भव सागर तर जाऊँ
हाय हाय जोगी रे.............
तुझसे ही है ये हरियाली महके डाली डाली
जो भी तुमको देखे जोगी छाये मुख पे लाली
हाय हाय जोगी रे............
ज्ञान की ज्योति तुम हो जगाते भक्ति की धारा बहाते
आनंद आनंद सबको आता दौड़ के द्वार पे आते
हाय हाय जोगी रे..........
तेरा दर्शन हर पल माँगू और न माँगू कुछ भी
तेरी इक मुस्कान पे वारूँ अपनी जिंदगी सारी
हाय हाय जोगी रे...........
बुरा हो इन बैरन अखियन का कर बैठीं नादानी
पहले मन में आग लगायी अब बरसाये पानी
हाय हाय जोगी रे...........
तेरे प्रेम में नीर बहाऊँ मूरत मन में बसाऊँ
तेरी याद में मेरे जोगी मैं बलिहारी जाऊँ
हाय हाय जोगी रे..........
उलटी प्रीत है जग की जोगी हाथ पकड़ कर तजना
साँची प्रीत है तेरी जोगी हाथ पकड़ नहीं तजना
हाय हाय जोगी रे...........
तेरे दर्श से मन हो पुलकित आनंद आनंद आये
तेरी अखियाँ ऐसे लागें जैसे हमें बुलायें
हाय हाय जोगी रे...........
चन्दा भी देखा तारे भी देखे देखा सूरज बरसों
जब से मैंने तुमको देखा मन में फूली सरसों
हाय हाय जोगी रे.............
जाने ना जाने ना, जग को खबर कब होगी ?
सूरत तेरी बड़ी है प्यारी अखियाँ हैं मतवाली
नज़र उतारूँ तेरी गुरूवर जाऊँ वारी वारी
हाय हाय जोगी रे.............
तेरा रूप है सबसे न्यारा तू सबका रखवाला
सबको नाच नचावे जोगी कैसा भोला भाला
हाय हाय जोगी रे.............
जब से मैंने तुमको देखा छूट गयी मनमानी
साँस साँस में नाम रटूँ तेरा हो गई मैं दीवानी
हाय हाय जोगी रे.............
मेरे दिलबर मेरे रहबर साथ सदा मेरे रहना
दूर न होना हमसे जोगी ऐसा तुमसे कहना
हाय हाय जोगी रे.............
तन मन में बस जाओ जोगी यह है मेरी मर्जी
इसको मेरा भाव समझ लो या समझो खुदगर्जी
हाय हाय जोगी रे.............
तुम ही तुम हो मेरे दिल में और कोई न रहता
मेरी साँसों की सरगम में तेरा नाम है रहता
हाय हाय जोगी रे.............
तेरे प्रेम में मैं बह जाऊँ मूरत मनवा बसाऊँ
तेरा सुमिरन करके जोगी भव सागर तर जाऊँ
हाय हाय जोगी रे.............
तुझसे ही है ये हरियाली महके डाली डाली
जो भी तुमको देखे जोगी छाये मुख पे लाली
हाय हाय जोगी रे............
ज्ञान की ज्योति तुम हो जगाते भक्ति की धारा बहाते
आनंद आनंद सबको आता दौड़ के द्वार पे आते
हाय हाय जोगी रे..........
तेरा दर्शन हर पल माँगू और न माँगू कुछ भी
तेरी इक मुस्कान पे वारूँ अपनी जिंदगी सारी
हाय हाय जोगी रे...........
बुरा हो इन बैरन अखियन का कर बैठीं नादानी
पहले मन में आग लगायी अब बरसाये पानी
हाय हाय जोगी रे...........
तेरे प्रेम में नीर बहाऊँ मूरत मन में बसाऊँ
तेरी याद में मेरे जोगी मैं बलिहारी जाऊँ
हाय हाय जोगी रे..........
उलटी प्रीत है जग की जोगी हाथ पकड़ कर तजना
साँची प्रीत है तेरी जोगी हाथ पकड़ नहीं तजना
हाय हाय जोगी रे...........
तेरे दर्श से मन हो पुलकित आनंद आनंद आये
तेरी अखियाँ ऐसे लागें जैसे हमें बुलायें
हाय हाय जोगी रे...........
चन्दा भी देखा तारे भी देखे देखा सूरज बरसों
जब से मैंने तुमको देखा मन में फूली सरसों
हाय हाय जोगी रे.............
जीवन रसायन :
१) जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्षों का काम कर लेना होगा । उसे इस युग की रफ़्तार से बहुत आगे निकलना होगा । जैसे स्वप्न में मान-अपमान, मेरा-तेरा, अच्छा-बुरा दिखता है और जागने के बाद उसकी सत्यता नहीं रहती वैसे ही इस जाग्रत जगत में भी अनुभव करना होगा । बस .... हो गया हजारों वर्षों का काम पूरा । ज्ञान की यह बात ह्रदय में ठीक से जमा देने वाले कोई महापुरुष मिल जाएँ तो हजारों वर्षों के संस्कार, मेरे तेरे के भ्रम को दो पल में ही निवृत कर दें और कार्य पूरा हो जाए ।
बड़ा सुंदर सा प्यारा सा नाम जिनका
बड़ा सुंदर सा प्यारा सा नाम जिनका
मोटेरा में है धाम जिनका
लोग कहते हैं बापू आसाराम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम
निर्धन हो या हो धनवान , समझें सबको एक समान
"शुभ" झलक मिल जाए तो -२ , टूट जाते हैं सारे अभिमान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
मुझको रंग दिया भक्ति के रंग में , प्रेम हो गया प्रभु जी के संग में
हो सामने तुम तो पता चले ना -२ , कब हो जाए सुबह कब शाम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
दाता तुम हो दया के सिन्धु , जिसको मिल जाए एक बिन्दु
ध्यान धरे जो मन से बापू -२, दिखे तुझमें राम और श्याम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
ग्रंथों का मुझे ज्ञान नहीं है , अच्छे-बुरे की पहचान नहीं है
तेरे मुख से निकले ज्ञान की गंगा -२, उसमें करता रहूँ स्नान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
मोटेरा में है धाम जिनका
लोग कहते हैं बापू आसाराम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम
निर्धन हो या हो धनवान , समझें सबको एक समान
"शुभ" झलक मिल जाए तो -२ , टूट जाते हैं सारे अभिमान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
मुझको रंग दिया भक्ति के रंग में , प्रेम हो गया प्रभु जी के संग में
हो सामने तुम तो पता चले ना -२ , कब हो जाए सुबह कब शाम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
दाता तुम हो दया के सिन्धु , जिसको मिल जाए एक बिन्दु
ध्यान धरे जो मन से बापू -२, दिखे तुझमें राम और श्याम
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
ग्रंथों का मुझे ज्ञान नहीं है , अच्छे-बुरे की पहचान नहीं है
तेरे मुख से निकले ज्ञान की गंगा -२, उसमें करता रहूँ स्नान
उनके चरणों में लाखों प्रणाम ......
रचना : अभिषेक मैत्रेय "शुभ"
Tuesday, November 18, 2008
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-२ आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-२ आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत
Tuesday, July 1, 2008
http://www.youtube.com/watch?v=A0HaZHhkJXg&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=A0HaZHhkJXg&feature=related
ॐ : गुरू पूनम का पर्व है आया - भजन : ॐ
गुरू पूनम का पर्व है आया , झूम - झूम कर मन ने गाया ।
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
साधक झूमें मस्ती में हरि नाम का जाम पिलाया ,
नाचे मनवा लहर - लहर गुरू नाम को तेरे गाया -२
प्यास बुझा जाओ , जल्दी से आ जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
दूर रहो बच्चो से बापू अब ये सहा ना जाये ,
कितनी पीडा ना मिलने की ये भी कहा ना जाये -२
मिलन बढ़ा जाओ , "शुभ" दर्शन दे जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
अंतर्यामी बापू ने वेदों का मनन कराया ,
लोभ मोह मद मत्सर के फंदो से हमे छुडाया -२
अमृत पिला जाओ , सत्संग सुना जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
साधक झूमें मस्ती में हरि नाम का जाम पिलाया ,
नाचे मनवा लहर - लहर गुरू नाम को तेरे गाया -२
प्यास बुझा जाओ , जल्दी से आ जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
दूर रहो बच्चो से बापू अब ये सहा ना जाये ,
कितनी पीडा ना मिलने की ये भी कहा ना जाये -२
मिलन बढ़ा जाओ , "शुभ" दर्शन दे जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
अंतर्यामी बापू ने वेदों का मनन कराया ,
लोभ मोह मद मत्सर के फंदो से हमे छुडाया -२
अमृत पिला जाओ , सत्संग सुना जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥
ॐ -: हे प्रभु आनंद दाता [प्रार्थना] :- ॐ
हे प्रभु आनंद दाता, ज्ञान हमको दीजिये
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये
लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
निंदा किसीकी हम किसीसे भूल कर भी न करें
ईर्ष्या कभी भी हम किसीसे भूल कर भी न करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में
हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में
हे प्रभु आनंद दाता.................................
मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
कीजिये हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा ॐ
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य सेवा करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये
लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
निंदा किसीकी हम किसीसे भूल कर भी न करें
ईर्ष्या कभी भी हम किसीसे भूल कर भी न करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में
हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में
हे प्रभु आनंद दाता.................................
मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
कीजिये हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा ॐ
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य सेवा करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................
हनुमानचालीसा
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥
हरि ॐ अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :
हरि ॐ
अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :
1. अनित्य में मन नहीं लगाकर नित्य की और बढ़ना शुरू करना चाहिए । समय तेज़ी से निकल रहा है ।
2. रोज संध्या का समय ६५ सेकंड के लिए आन्तरिक कुम्भक और ४० सेकंड के लिए वाह्य कुम्भक पक्का करो । ऐसे ७ प्राणायाम करें ।
3. गहरी श्वास अन्दर लेते समय सोचे की ईश्वरीय चैतन्य को अन्दर ले रहे है .... फिर श्वास रोके तो सोचें कि मैं प्रभु का और प्रभु मेरे, बस ...
और श्वास बाहर निकालते समय सोचें कि सारी पुरानी बातें और सारे निगेटिव विचार बाहर निकल रहे हैं . ऐसे रोजाना प्रयोग करें और ॐ कि धुन में ध्यान में बैठ जायें । ऐसा ४० दिन करें बहुत आध्यात्मिक उन्नति होगी।
4. पेट ख़राब रहता हो तो बाहरी कुम्भक में त्रिबंध लगाकर बैठकर पेट को अंदर-बाहर करिये और मन में रं रं रं जप करिये।
5. जो भी प्राणायाम करें उसे त्रिबंध लगाकर ही करें ।
6. श्वासों श्वास का ध्यान अनिवार्य ।
7. शिशंक आसन में रोज़ बैठना है । २ मिनट बडों के लिए और ३ मिनट स्टूडेंट्स के लिए । वज्र आसन में बैठकर जब सिर को ज़मीन पर लगाते हैं उसे "शिशंक" आसन कहते हैं ।
ध्यान दें : जब बाहरी कुम्भक करें तब वज्र आसन में बैठकर करें ।
8. इन दिनों बिना नमक के खाना सेहत के लिए अच्छा है ।
9. इन दिनों जप बढ़ा दे जब तक नवरात्र हैं ।
10. आंवला रोज़ खाने से आंते शुद्ध होती है । इन दिनों आंवला खाइए ।
11.श्रद्धा का जीवन में बहुत लाभ है । ये विश्व श्रद्धा से चल रहा है न की किसी और से । श्रद्धा बढाओ और भगवान में प्रीती ।
12. रोज़ सुबह उठकर थोडी देर भगवान से बातें करें और रात को सोने से पहले भी । पक्का नियम बना लें ।
अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :
1. अनित्य में मन नहीं लगाकर नित्य की और बढ़ना शुरू करना चाहिए । समय तेज़ी से निकल रहा है ।
2. रोज संध्या का समय ६५ सेकंड के लिए आन्तरिक कुम्भक और ४० सेकंड के लिए वाह्य कुम्भक पक्का करो । ऐसे ७ प्राणायाम करें ।
3. गहरी श्वास अन्दर लेते समय सोचे की ईश्वरीय चैतन्य को अन्दर ले रहे है .... फिर श्वास रोके तो सोचें कि मैं प्रभु का और प्रभु मेरे, बस ...
और श्वास बाहर निकालते समय सोचें कि सारी पुरानी बातें और सारे निगेटिव विचार बाहर निकल रहे हैं . ऐसे रोजाना प्रयोग करें और ॐ कि धुन में ध्यान में बैठ जायें । ऐसा ४० दिन करें बहुत आध्यात्मिक उन्नति होगी।
4. पेट ख़राब रहता हो तो बाहरी कुम्भक में त्रिबंध लगाकर बैठकर पेट को अंदर-बाहर करिये और मन में रं रं रं जप करिये।
5. जो भी प्राणायाम करें उसे त्रिबंध लगाकर ही करें ।
6. श्वासों श्वास का ध्यान अनिवार्य ।
7. शिशंक आसन में रोज़ बैठना है । २ मिनट बडों के लिए और ३ मिनट स्टूडेंट्स के लिए । वज्र आसन में बैठकर जब सिर को ज़मीन पर लगाते हैं उसे "शिशंक" आसन कहते हैं ।
ध्यान दें : जब बाहरी कुम्भक करें तब वज्र आसन में बैठकर करें ।
8. इन दिनों बिना नमक के खाना सेहत के लिए अच्छा है ।
9. इन दिनों जप बढ़ा दे जब तक नवरात्र हैं ।
10. आंवला रोज़ खाने से आंते शुद्ध होती है । इन दिनों आंवला खाइए ।
11.श्रद्धा का जीवन में बहुत लाभ है । ये विश्व श्रद्धा से चल रहा है न की किसी और से । श्रद्धा बढाओ और भगवान में प्रीती ।
12. रोज़ सुबह उठकर थोडी देर भगवान से बातें करें और रात को सोने से पहले भी । पक्का नियम बना लें ।
Friday, May 23, 2008
Thursday, May 22, 2008
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू मेरा चाँद वर्गा
एस दी कृपा बड़ी निराली
वेख लें दे मथा टेक लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू सदगुरु बनकर आया मैंने वेख लें दे.रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बूटे बूटे पानी लावे
सूखे बुटे हरे बनावे
नि ओ माली बनकर आया मैनू वेख लें दे
मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
चिट्टा चिट्टा चोला पावे
सिर ते सोणी टोपी लावे
हाथ विच फुल्ला दा हार मैनू वेख लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
नाम दी उसने पयाऊ लगाई
हरी ॐ नाल दुनिया झुमाई
नाम दा अमृत मैंने पीके वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बर्हमज्ञान दी महक पिलावे
जो कोई धयावे ओही तर जावे
बर्हम दा प्रेम स्वरूप मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरु दा चरणी तीरथ तारे
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
आया तारणहारा मैनू वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
जिथे वी ओ चरण छुआवे
पत्थर दिल उतहे पिघल जावे
आया पार उतारन मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरुआ दी महिमा गायी न जावे
तिर्लोकी एत्हे झूम जाये
आया पर उतारन मैंने देख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
Wednesday, May 7, 2008
श्री आसारामायण अनुष्ठान विधि

श्री आसारामायण अनुष्ठान विधि
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जहाँ पर अनुष्ठान करना हो, वहाँ ईशान कोण ( पूर्व व उत्तर के बीच की दिशा) में तुलसी का पौधा रखें । पाँच चीजों (गोमूत्र , हल्दी, कुमकुम, गंगाजल, शुद्ध इत्र या शुद्ध गुलाबजल) से पूर्व या उत्तर की दीवार पर समान लम्बाई - चौडाई का स्वस्तिक चिन्ह ( ) बनाये तथा उसके बाजू में पूज्य बापू जी की तस्वीर रख दें। फिर जमीन पर सफ़ेद या केसरी रंग का नया , पतला कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर गेहूँ के दानों से स्वस्तिक बना कर उस पर पानी का लोटा रख दें । लोटे के ऊपरी भाग में आम के पत्ते रखें व उन पर नारियल रख दें ।
उसके बाद तिलक करके ' ॐ गं गणपतये नमः ' मंत्र बोलते हुए , जिस उद्देश्य से अनुष्ठान करना है उसका संकल्प करें । फिर श्वास भरकर रोकें और महा मृत्युंजय मंत्र या गायत्री मंत्र का तीन बार जप करें तथा मन में संकल्प दोहराएँ कि 'मेरा अमुक कार्य अवश्य पूर्ण होगा ।' ऐसा तीन बार करें । अनुष्ठान जितने भि इदन में पूर्ण करना हो उनमें प्रत्येक सत्र (बैठक) में यह मंत्र व संकल्प दोहराना है । प्रतिदिन निश्चित संख्या में पाठ करें । अनुष्ठान के समय धुप करें तथा दीपक जलता रहे ।
अनुष्ठान की समाप्ति पर लोटे का जल तुलसी की जड़ में साल दें । गेहूँ के दाने पक्षियों के डालें , नारियल प्रसाद रूप में बाँट दें या बहती जल में प्रवाहित कर दें । गुरुमंत्र के जप से १०८ आहुतियाँ दे कर हवन कर लें तथा एक या तीन अथवा पाँच -सात कन्याओं को भोजन करायें । दृढ श्रद्धा -विश्वास , संयम तथा तत्परता पूर्वक इस विधि से अनुष्ठान करने वालो की मनोकामना पूर्ण होने में मदद मिलती है ।
(स्वामी सुरेशानंद जी के प्रवचन से ) - लोक कल्याण सेतु : अंक १२६ । १६ दिसम्बर २००७ से १५ जनवरी २००८
Friday, April 25, 2008
Agar dena chaaho to ek var ye dena
Agar dena chaaho to ek var ye dena
Guru charno main preeti badhti hi jae
Agar lena chaaho ye jeewan hi le lo
Magar meri shraddha ko ghatne na dena
Man main kabhi na ahankaar aae
Guru charno ka dhyaan khone na paae
Rahe saas chalti ye tan main jabhi tak
Har ik shwaas gungaan tera hi gaae
Kahi tucchh abhimaan aane na pae
Asat drishya sat se digaane na pae
Ye sukh dukh man ko bhulaane na pae
Kahi bhi samay vyarth jaane n
Guru charno main preeti badhti hi jae
Agar lena chaaho ye jeewan hi le lo
Magar meri shraddha ko ghatne na dena
Man main kabhi na ahankaar aae
Guru charno ka dhyaan khone na paae
Rahe saas chalti ye tan main jabhi tak
Har ik shwaas gungaan tera hi gaae
Kahi tucchh abhimaan aane na pae
Asat drishya sat se digaane na pae
Ye sukh dukh man ko bhulaane na pae
Kahi bhi samay vyarth jaane n
Aap sabhi ko Pujyashri ke avataran divas ki khoob khoob badhai ho
The Birth of a Spiritual Giant
(Excerpts from the Satsang of Pujya Bapuji)
(Pujya Bapuji’s incarnation day 26th of April)
The scriptures talk of different types of incarnations of God. One of them is the Nitya Avatara in the form of Enlightened Saints.
There have been many such incarnations of God on this earth like Vallabhacharya, Shankaracharya, Nimbakacharya, Kabirji, Guru Nanak, Sri Ramakrishna Paramahamsa, Param Pujya Sri Lilashahji Bapu to name just a few.
‘The entire lineage of a Saint is sanctified, glorified is the mother of a Saint; the land treaded on by a Saint becomes holy.’
Ordinary beings are born out of the bonds of karma effectuated by the momentum of desires. But it is not so with God or Saints, whose descent on the earth is known as an incarnation, not birth.
God and Saints incarnate on earth for the good of the masses. They come to this earth to fulfil a particular mission or in kind response to the piteous prayers of people. That is, those who manifest themselves in human form to give shape to our good faith, honest objectives and genuine needs are known as incarnations or incarnate personages.
The birth of the body is not a big thing, nor is its birthday celebration. The real worthy thing is fulfilling the true objective of the birth. The incarnation day of Brahmajnani Saints who have fulfilled this exalted objective inspires us towards that lofty goal. Therefore, this is an appropriate occasion to celebrate, and all of us should celebrate it.
‘He who has realized his own (True) Self has indeed achieved the real great feat in the world.’
There are around 6.5 billion people on earth. About 17.5 million people celebrate their birthday every day. The real benefit of celebrating the birthday is obtained only when one makes some positive resolve on this day. Suppose you have completed 30 years of your life and are entering the 31st. You should take stock of the past years and analyse your wrong doings. On your 31st birthday you should resolve not to repeat your past mistakes and commit yourself towards new pious endeavours. This is the only meaningful way to celebrate a birthday.
The Truth however remains that you were never born.
‘The Atman is never born nor does it die; nor is it subject to birth and death on coming into being. Unborn, eternal, ever-lasting and ancient, it is not killed when the body dies.’ (Srimad Bhagwad Gita: 2.20)
People say, “Bapuji! Congratulations!”
“What for?”
“Today is your birthday.”
I am not a fool to believe this, for I know, “I was never born. It is the body that is born.”
On my birthday I don’t want any gift, money or congratulations from you. I only want your well-being, your supreme good. And what constitutes your well-being?
Your true well-being lies in realizing the fact that the world is transient, that circumstances come and go, but your True Self is eternal, unperishable and immortal even though the bodies are subject to birth and death.
I don’t find any meaning in birthday-congratulations… Still I accept such congratulations, for it gives you an opportunity to attend Satsang and listen to the Truth that you are the immortal Pure Consciousness, the Atman, distinct from the body. I congratulate you on that account and myself accept the same, for I too am That…
The Lord states in the Srimad Bhagwad Gita (10.3), ‘He who knows Me as the unborn, beginningless, Supreme Lord of the worlds is undeluded among mortals and is liberated from all sins.’
In fact, the ideal celebration of a Saint’s incarnation day is not confined to just rejoicing through bursting of fire crackers and distributing sweets; the true celebration of a Saint’s incarnation day lies in drawing inspiration from the Saint’s life, imbibing His divine virtues, and thereby manifesting Saintliness in one’s own life.
(Excerpts from the Satsang of Pujya Bapuji)
(Pujya Bapuji’s incarnation day 26th of April)
The scriptures talk of different types of incarnations of God. One of them is the Nitya Avatara in the form of Enlightened Saints.
There have been many such incarnations of God on this earth like Vallabhacharya, Shankaracharya, Nimbakacharya, Kabirji, Guru Nanak, Sri Ramakrishna Paramahamsa, Param Pujya Sri Lilashahji Bapu to name just a few.
‘The entire lineage of a Saint is sanctified, glorified is the mother of a Saint; the land treaded on by a Saint becomes holy.’
Ordinary beings are born out of the bonds of karma effectuated by the momentum of desires. But it is not so with God or Saints, whose descent on the earth is known as an incarnation, not birth.
God and Saints incarnate on earth for the good of the masses. They come to this earth to fulfil a particular mission or in kind response to the piteous prayers of people. That is, those who manifest themselves in human form to give shape to our good faith, honest objectives and genuine needs are known as incarnations or incarnate personages.
The birth of the body is not a big thing, nor is its birthday celebration. The real worthy thing is fulfilling the true objective of the birth. The incarnation day of Brahmajnani Saints who have fulfilled this exalted objective inspires us towards that lofty goal. Therefore, this is an appropriate occasion to celebrate, and all of us should celebrate it.
‘He who has realized his own (True) Self has indeed achieved the real great feat in the world.’
There are around 6.5 billion people on earth. About 17.5 million people celebrate their birthday every day. The real benefit of celebrating the birthday is obtained only when one makes some positive resolve on this day. Suppose you have completed 30 years of your life and are entering the 31st. You should take stock of the past years and analyse your wrong doings. On your 31st birthday you should resolve not to repeat your past mistakes and commit yourself towards new pious endeavours. This is the only meaningful way to celebrate a birthday.
The Truth however remains that you were never born.
‘The Atman is never born nor does it die; nor is it subject to birth and death on coming into being. Unborn, eternal, ever-lasting and ancient, it is not killed when the body dies.’ (Srimad Bhagwad Gita: 2.20)
People say, “Bapuji! Congratulations!”
“What for?”
“Today is your birthday.”
I am not a fool to believe this, for I know, “I was never born. It is the body that is born.”
On my birthday I don’t want any gift, money or congratulations from you. I only want your well-being, your supreme good. And what constitutes your well-being?
Your true well-being lies in realizing the fact that the world is transient, that circumstances come and go, but your True Self is eternal, unperishable and immortal even though the bodies are subject to birth and death.
I don’t find any meaning in birthday-congratulations… Still I accept such congratulations, for it gives you an opportunity to attend Satsang and listen to the Truth that you are the immortal Pure Consciousness, the Atman, distinct from the body. I congratulate you on that account and myself accept the same, for I too am That…
The Lord states in the Srimad Bhagwad Gita (10.3), ‘He who knows Me as the unborn, beginningless, Supreme Lord of the worlds is undeluded among mortals and is liberated from all sins.’
In fact, the ideal celebration of a Saint’s incarnation day is not confined to just rejoicing through bursting of fire crackers and distributing sweets; the true celebration of a Saint’s incarnation day lies in drawing inspiration from the Saint’s life, imbibing His divine virtues, and thereby manifesting Saintliness in one’s own life.
Friday, February 15, 2008
श्री आसारामायण
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गुरु चरण रज शीश धरी , हृदय रूप विचार ।
श्री आसारामायण कहों , वेदान्त को सार ॥
धर्म कामार्थ मोक्ष दे , रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से , शीघ्र हो बेडा पार ॥
भारत सिंधु नदी बखानी , नवाब जिले में गाँव बेराणी
रहता एक सेठ गुनखानी , नाम थाउमल सिरुमलानी
आज्ञा में रहती मेंह्गीबा , पति परायण नाम मंगीबा
चैत वद छः उन्नीस अठानवे , आसुमल अवतरित आँगने
माँ मन में उमडा सुख सागर , द्वार पे आया एक सौदागर
लाया एक अति सुन्दर झूला , देख पिता मन हर्ष से फूला
सभी चकित ईश्वर की माया , उचित समय पर कैसे आया
ईश्वर की यह लीला भारी , बालक है कोई चमत्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
संत सेवा और श्रुति श्रवण , मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई , पुण्यों का फल भारी ॥
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी
समाज में थी मान्यता जैसी , प्रचलित एक कहावत ऐसी
तीन बहन के बाद जो , आता पुत्र वह त्रेखन कहलाता
होता अशुभ अमंगल कारी , दरिद्रता लाता है भारी
विपरीत किन्तु दिया दिखाई , घर में जैसे लक्ष्मी आई
तिरलोकी का आसन डोला , कुबेर ने भण्डार ही खोला
मान प्रतिष्ठा और बढाई , सब के मन सुख शांति छाई
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
तेजोमय बालक बढा , आनंद बढा अपार ।
शील शांति का आत्मधन , करने लगा विस्तार ॥
एक दिना थाउमल द्वारे , कुलगुरु परशुराम पधारे
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे , अनायास ही सहसा पुकारे
यह नहीं बालक साधारण , दैवी लक्षण तेज हैं कारण
नेत्रों में है सात्विक लक्षण , इसके कार्य बडे विलक्षण
यह तो महान संत बनेगा , लोगों का उद्धार करेगा
सुनी गुरु की भविष्य वाणी , गद गद हो गए सिरुमलानी
माता ने भी माथा चूमा , हर कोई ले करके घूमा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ज्ञानी वैरागी पूर्व का , तेरे घर में आये ।
जन्म लिया है योगी ने , पुत्र तेरा कहलाये ॥
पावन तेरा कुल हुआ , जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ , पूर्ण चार पुरुषार्थ ॥
सैतालिस में देश विभाजन , पाक में छोडा भू पशु औ धन
भारत अमदाबाद में आये , मणिनगर में शिक्षा पाए
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति , असुमल की आशु युक्ति
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता , त्वरित कार्य और सहनशीलता
आसुमल प्रसन्न मुख रहते , शिक्षक हसमुख भाई कहते
पिस्ता बादाम काजू अखरोट , भरे जेब खाते भर पेटा
दे दे मक्खन मिश्री कूजा , माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे , रहे न मछली जल बिन जैसे
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे , वही है विद्या या विमुक्तये
बहुत रात तक पैर दबाते , भरे कंठ पितु आशीष पाते
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पुत्र तुम्हारा जगत में , सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा , पूरन होंगे काम ॥
सिर से हटी पिता की छाया , तब माया ने जाल फैलाया
बडे भाई का हुआ दुसाशन , व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा , शुरू हो गई अग्नि परीक्षा
गए सिद्धपुर नौकरी करने , कृष्ण के आगे बहाए झरने
सेवक सखा भाव से भीजे , गोविन्द माधव तब रीझे
एक दिना एक माई आई , बोली हे भगवन सुखदायी
पड़े पुत्र दुख मुझे झेलने , खून केस दो बेटे जेल में
बोले आसु सुख पावेंगे , निर्दोष छुट जल्दी आवेंगे
बेटे घर आये माँ भागी , आसुमल के पावों लगी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसुमल का पुष्ट हुआ , आलोकिक प्रभाव ।
वाक सिद्धि की शक्ति का , हो गया प्रादुर्भाव ॥
बरस सिद्धपुर तीन बिताये , लौट अहमदाबाद में आये
करने लगी लक्ष्मी नर्तन , किया भाई का दिल परिवर्तन
दरिद्रता को दूर कर दिया , घर वैभव भरपूर कर दिया
सिनेमा उन्हें कभी न भाये , बलात ले गए रोते आये
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया , उसको ही अब रोना आया
माँ करना चाहती थी शादी , आसुमल का मन वैरागी
फिर भी सबने शक्ति लगाई , जबरन कर दी उनकी सगाई
शादी को जब हुआ उनका मन , आसुमल कर गए पलायन
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पंडित कहा गुरु समर्थ को , रामदास सावधान ।
शादी फेरे फिरते हुए , भागे छुडा कर जान ॥
करत खोज में निकल गया दम , मिले भरुच में अशोक आश्रम
कठिनाई से मिला रास्ता , प्रतिष्ठा का दिया वास्ता
घर में लाये आजमाये गुर , बारात ले पहुंचे आदिपुर
विवाह हुआ पर मन द्रढाया , भगत ने पत्नी को समझाया
अपना व्यवहार होगा ऐसे , जल में कमल रहता है जैसे
सांसारिक व्यवहार तब होगा , जब मुझे साक्षात्कार होगा
साथ रहे ज्यूँ आत्मा काया , साथ रहे वैरागी माया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
अनश्वर हूँ मैं जानता , सत-चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ , होवे परमानन्द ॥
मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु , संस्कृत भाषा है एक सेतु
संस्कृत की शिक्षा पायी , गति और साधना बढाई
एक श्ळोक ह्रदय में पैठा , वैराग्य सोया उठ बैठा
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित , उनकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित
लक्ष्मी देवी को समझाया , ईश प्राप्ति ध्येय बताया
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा , लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा
केदारनाथ के दर्शन पाए , लक्षाधिपति आशीष पाए
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये , ईश प्राप्ति आशीष पाए
आये कृष्ण लीला स्थली में , वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला , वे जा पहुंचे नैनिताला
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित , स्वामी लीलाशाह प्रतिष्टित
भीतर तरल थे बाहर कठोरा , निर्विकल्प ज्यूँ कागज़ कोरा
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी , ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ईश-कृपा बिन गुरु नहीं गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहि वेद-पुराण ॥
जानने को साधक की कोटी , सत्तर दिन तक हुई कसौटी
कंचन को अग्नि में तपाया , गुरु ने आसुमल बुलवाया
कहा गृहस्थ हो कर्म करना , ध्यान भजन घर पर ही करना
आज्ञा मानी घर पर आये , पक्ष में मोटी-कोरल धाए
नर्मदा तट पर ध्यान लगाए , लालजी महाराज आकर्षाये
सप्रेम शील स्वामी पँह धाए , दत्त-कुटीर में साग्रह लाये
उमडा प्रभु प्रेम का चस्का , अनुष्ठान चालीस दिवस का
मरे छः शत्रु स्थिति पायी , ब्रह्मनिष्ठ्ता सहज समाई
शुभाशुभ सम रोना-गाना , ग्रीष्म ठंड मान और अपमाना
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास , महल और कुटिया आस निरास
भक्ति योग ज्ञान अभ्यासी , हुए समान मगहर और कासी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
भाव ही कारण ईश है , न स्वर्ण काठ पाषाण ।
सत-चित-आनंद रूप है , व्यापक है भगवान ॥
ब्रह्मेशान जनार्दन , सारद शेष गणेश ।
निराकार साकार है , है सर्वत्र भवेश ॥
हुए आसुमल ब्रह्म-अभ्यासी , जन्म अनेको लागे बासी
दूर हो गयी आधि व्याधि , सिद्ध हो गयी सहज समाधि
इक रात नदी तट मन आकर्षा , आई जोर से आंधी वर्षा
बंद मकान बरामदा खाली , बैठे वहीं समाधि लगा ली
देखा किसी ने सोचा डाकू , लाये लाठी भाला चाकू
दौडे चीखे शोर मच गया , टूटी समाधि ध्यान खिंच गया
साधक उठा थे बिखरे केशा , राग द्वेष ना किंचित लेशा
सरल लोगों ने साधू माना , हत्यारों ने काल ही जाना
भैरव देख दुष्ट घबराए , पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाए
कामी जनों ने आशिक माना , साधुजन कीन्हें परनामा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दृष्टि देखे सभी चले शांत गंभीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को सहज गए वे चीर ॥
माता आई धर्म की सेवी , साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी
दोनों फूट-फूट के रोई , रुदन देख करुना भी रोई
संत लालजी हृदय पसीजा , हर दर्शक आंसू में भीजा
कहा सभी ने आप जइयो , आसुमल बोले की भाइयों
चालीस दिवस हुआ नही पूरा , अनुष्ठान है मेरा अधूरा
आसुमल ने छोडी तितिक्षा , माँ पत्नी ने की प्रतीक्षा
जिस दिन गाँव से हुई विदाई जार जार रोए लोग लुगाई
अहमदाबाद को हुए रवाना , मिया-गाँव से किया पयाना
मुम्बई गए गुरु की चाह , मिले वहीं पे लीलाशाह
परम पिता ने पुत्र को देखा , सूर्य ने घट जल में पेखा
घटक तोड़ जल जल में मिलाया , जल प्रकाश आकाश में छाया
निज स्वरूप का ज्ञान द्रढाया , ढाई दिवस होश न आया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्यान्ह ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार ॥
परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया , जीव गया और शिव को पाया
जान लिया हूँ शांत निरंजन , लागू मुझे न कोई बन्धन
यह जगत सारा है नश्वर , मैं ही शाश्वत एक अनश्वर
दीद है दो पर दृष्टि एक है , लघु गुरु में वही एक है
सर्वत्र एक किसे बतलाये , सर्व व्याप्त कहाँ आये जाये
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा , चले उसकी इच्छा अनुसारा
यदि वह संकल्प चलाये , मुर्दा भी जीवित हो जाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य रहे न शेष ।
मोह कभी न ठग सके , इच्छा नहीं लवलेश ॥
पूर्ण गुरु कृपा मिली , पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते , ब्रह्मानंद का आनंद लेते
खाते पीते मौन या कहते , ब्रह्मानंद मस्ती में रहते
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश , गृहस्थ साधु करो उपदेश
किये गुरु ने वारे न्यारे , गुजरात डीसा गाँव पधारे
मृत गाय दिया जीवन दाना , तब से लोगों ने पहचाना
द्वार पे कहते नारायण हरि , लेने जाते कभी मधुकरी
तब से वे सत्संग सुनाते , सभी आरती शांति पाते
जो आया उद्धार कर दिया , भक्त का बेडा पार कर दिया
कितने मरणासन्न जिलाए , व्यसन मांस और मद्य छुडाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दिन मन उकता गया , किया डीसा से कूच ।
आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूँक ॥
वे नारेश्वर धाम पधारे , जा पहुंचे नर्मदा किनारे
मीलों पीछे छोडा मंदिर , गए घोर जंगल के अन्दर
घने वृक्ष तले पत्थर पर , बैठे ध्यान निरंजन का धर
रात गयी प्रभात हो आई बाल रवि ने सूरत दिखाई
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता , छूटा ध्यान उठे तब संता
प्रातर्विधि निवृत हो आये , तब आभास क्षुधा का पाए
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा , यहीं बैठ कर अब खाऊँगा
जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि कर्ता खुद लाएगा
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये , त्यों ही दो किसान वहाँ आये
दोनों सिर पर बांधे साफा , खाद्य पेय लिए दोनों हाथा
बोले जीवन सफल है आज , अर्घ्य स्वीकारो महाराज
बोले संत और पे जाओ जो है तुम्हारा उसे खिलाओ
बोले किसान आपको देखा , स्वप्न में मार्ग रात को देखा
हमारा न कोई संत है दूजा , आओ गाँव करें तुमरी पूजा
आसाराम तब मन में धारे , निराकार आधार हमारे
पिया दूध थोडा फल खाया , नदी किनारे जोगी धाय
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गांधीनगर गुजरात में , है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का , यहीं है पावन धाम ॥
आत्मानंद में मस्त है , करे वेदान्ती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का , सदगुरु करते मेल ॥
साधिकाओं का अलग , आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा , जिसका नहीं बयान ॥
बालक वृद्ध और नर नारी , सभी प्रेरणा पाए भारी
एक बार जो दर्शन पाए , शांति का अनुभव हो जाये
नित्य विविध प्रयोग कराये , नादानुसंधान बताये
नाभि से वे ओम कहलायें , हृदय से वे राम कहलायें
सामान्य ध्यान जो लगाये , उन्हें वे गहरे में ले जायें
सबको निर्भय योग सिखाएं , सबका आत्मोत्थान करायें
हजारों के रोग मिटाए , और लाखों के शोक छुडाये
अमृतमय प्रसाद जब देते , भक्त का रोग शोक हर लेते
जिसने नाम का दान लिया है , गुरु अमृत का पान किया है
उनका योग क्षेम वे रखते , वे न तीन तापों से तपते
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते , आपद रोगों से बच जाते
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं , सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं
सचमुच गुरु हैं दीन दयाल , सहज ही कर देते हैं निहाल
वे चाहते सब झोली भर ले , निज आत्मा का दर्शन कर लें
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे , उनके सारे काज सरेंगे
गंगाराम शील है दासा , होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वराभयदाता सदगुरु , परम ही भक्त कृपाल ।
निश्चल प्रेम से जो भजे , साँई करे निहाल ॥
मन में नाम तेरा रहे , मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये , रहे चरण में प्रीत ॥
गुरु चरण रज शीश धरी , हृदय रूप विचार ।
श्री आसारामायण कहों , वेदान्त को सार ॥
धर्म कामार्थ मोक्ष दे , रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से , शीघ्र हो बेडा पार ॥
भारत सिंधु नदी बखानी , नवाब जिले में गाँव बेराणी
रहता एक सेठ गुनखानी , नाम थाउमल सिरुमलानी
आज्ञा में रहती मेंह्गीबा , पति परायण नाम मंगीबा
चैत वद छः उन्नीस अठानवे , आसुमल अवतरित आँगने
माँ मन में उमडा सुख सागर , द्वार पे आया एक सौदागर
लाया एक अति सुन्दर झूला , देख पिता मन हर्ष से फूला
सभी चकित ईश्वर की माया , उचित समय पर कैसे आया
ईश्वर की यह लीला भारी , बालक है कोई चमत्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
संत सेवा और श्रुति श्रवण , मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई , पुण्यों का फल भारी ॥
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी
समाज में थी मान्यता जैसी , प्रचलित एक कहावत ऐसी
तीन बहन के बाद जो , आता पुत्र वह त्रेखन कहलाता
होता अशुभ अमंगल कारी , दरिद्रता लाता है भारी
विपरीत किन्तु दिया दिखाई , घर में जैसे लक्ष्मी आई
तिरलोकी का आसन डोला , कुबेर ने भण्डार ही खोला
मान प्रतिष्ठा और बढाई , सब के मन सुख शांति छाई
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
तेजोमय बालक बढा , आनंद बढा अपार ।
शील शांति का आत्मधन , करने लगा विस्तार ॥
एक दिना थाउमल द्वारे , कुलगुरु परशुराम पधारे
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे , अनायास ही सहसा पुकारे
यह नहीं बालक साधारण , दैवी लक्षण तेज हैं कारण
नेत्रों में है सात्विक लक्षण , इसके कार्य बडे विलक्षण
यह तो महान संत बनेगा , लोगों का उद्धार करेगा
सुनी गुरु की भविष्य वाणी , गद गद हो गए सिरुमलानी
माता ने भी माथा चूमा , हर कोई ले करके घूमा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ज्ञानी वैरागी पूर्व का , तेरे घर में आये ।
जन्म लिया है योगी ने , पुत्र तेरा कहलाये ॥
पावन तेरा कुल हुआ , जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ , पूर्ण चार पुरुषार्थ ॥
सैतालिस में देश विभाजन , पाक में छोडा भू पशु औ धन
भारत अमदाबाद में आये , मणिनगर में शिक्षा पाए
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति , असुमल की आशु युक्ति
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता , त्वरित कार्य और सहनशीलता
आसुमल प्रसन्न मुख रहते , शिक्षक हसमुख भाई कहते
पिस्ता बादाम काजू अखरोट , भरे जेब खाते भर पेटा
दे दे मक्खन मिश्री कूजा , माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे , रहे न मछली जल बिन जैसे
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे , वही है विद्या या विमुक्तये
बहुत रात तक पैर दबाते , भरे कंठ पितु आशीष पाते
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पुत्र तुम्हारा जगत में , सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा , पूरन होंगे काम ॥
सिर से हटी पिता की छाया , तब माया ने जाल फैलाया
बडे भाई का हुआ दुसाशन , व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा , शुरू हो गई अग्नि परीक्षा
गए सिद्धपुर नौकरी करने , कृष्ण के आगे बहाए झरने
सेवक सखा भाव से भीजे , गोविन्द माधव तब रीझे
एक दिना एक माई आई , बोली हे भगवन सुखदायी
पड़े पुत्र दुख मुझे झेलने , खून केस दो बेटे जेल में
बोले आसु सुख पावेंगे , निर्दोष छुट जल्दी आवेंगे
बेटे घर आये माँ भागी , आसुमल के पावों लगी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसुमल का पुष्ट हुआ , आलोकिक प्रभाव ।
वाक सिद्धि की शक्ति का , हो गया प्रादुर्भाव ॥
बरस सिद्धपुर तीन बिताये , लौट अहमदाबाद में आये
करने लगी लक्ष्मी नर्तन , किया भाई का दिल परिवर्तन
दरिद्रता को दूर कर दिया , घर वैभव भरपूर कर दिया
सिनेमा उन्हें कभी न भाये , बलात ले गए रोते आये
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया , उसको ही अब रोना आया
माँ करना चाहती थी शादी , आसुमल का मन वैरागी
फिर भी सबने शक्ति लगाई , जबरन कर दी उनकी सगाई
शादी को जब हुआ उनका मन , आसुमल कर गए पलायन
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पंडित कहा गुरु समर्थ को , रामदास सावधान ।
शादी फेरे फिरते हुए , भागे छुडा कर जान ॥
करत खोज में निकल गया दम , मिले भरुच में अशोक आश्रम
कठिनाई से मिला रास्ता , प्रतिष्ठा का दिया वास्ता
घर में लाये आजमाये गुर , बारात ले पहुंचे आदिपुर
विवाह हुआ पर मन द्रढाया , भगत ने पत्नी को समझाया
अपना व्यवहार होगा ऐसे , जल में कमल रहता है जैसे
सांसारिक व्यवहार तब होगा , जब मुझे साक्षात्कार होगा
साथ रहे ज्यूँ आत्मा काया , साथ रहे वैरागी माया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
अनश्वर हूँ मैं जानता , सत-चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ , होवे परमानन्द ॥
मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु , संस्कृत भाषा है एक सेतु
संस्कृत की शिक्षा पायी , गति और साधना बढाई
एक श्ळोक ह्रदय में पैठा , वैराग्य सोया उठ बैठा
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित , उनकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित
लक्ष्मी देवी को समझाया , ईश प्राप्ति ध्येय बताया
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा , लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा
केदारनाथ के दर्शन पाए , लक्षाधिपति आशीष पाए
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये , ईश प्राप्ति आशीष पाए
आये कृष्ण लीला स्थली में , वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला , वे जा पहुंचे नैनिताला
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित , स्वामी लीलाशाह प्रतिष्टित
भीतर तरल थे बाहर कठोरा , निर्विकल्प ज्यूँ कागज़ कोरा
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी , ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ईश-कृपा बिन गुरु नहीं गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहि वेद-पुराण ॥
जानने को साधक की कोटी , सत्तर दिन तक हुई कसौटी
कंचन को अग्नि में तपाया , गुरु ने आसुमल बुलवाया
कहा गृहस्थ हो कर्म करना , ध्यान भजन घर पर ही करना
आज्ञा मानी घर पर आये , पक्ष में मोटी-कोरल धाए
नर्मदा तट पर ध्यान लगाए , लालजी महाराज आकर्षाये
सप्रेम शील स्वामी पँह धाए , दत्त-कुटीर में साग्रह लाये
उमडा प्रभु प्रेम का चस्का , अनुष्ठान चालीस दिवस का
मरे छः शत्रु स्थिति पायी , ब्रह्मनिष्ठ्ता सहज समाई
शुभाशुभ सम रोना-गाना , ग्रीष्म ठंड मान और अपमाना
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास , महल और कुटिया आस निरास
भक्ति योग ज्ञान अभ्यासी , हुए समान मगहर और कासी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
भाव ही कारण ईश है , न स्वर्ण काठ पाषाण ।
सत-चित-आनंद रूप है , व्यापक है भगवान ॥
ब्रह्मेशान जनार्दन , सारद शेष गणेश ।
निराकार साकार है , है सर्वत्र भवेश ॥
हुए आसुमल ब्रह्म-अभ्यासी , जन्म अनेको लागे बासी
दूर हो गयी आधि व्याधि , सिद्ध हो गयी सहज समाधि
इक रात नदी तट मन आकर्षा , आई जोर से आंधी वर्षा
बंद मकान बरामदा खाली , बैठे वहीं समाधि लगा ली
देखा किसी ने सोचा डाकू , लाये लाठी भाला चाकू
दौडे चीखे शोर मच गया , टूटी समाधि ध्यान खिंच गया
साधक उठा थे बिखरे केशा , राग द्वेष ना किंचित लेशा
सरल लोगों ने साधू माना , हत्यारों ने काल ही जाना
भैरव देख दुष्ट घबराए , पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाए
कामी जनों ने आशिक माना , साधुजन कीन्हें परनामा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दृष्टि देखे सभी चले शांत गंभीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को सहज गए वे चीर ॥
माता आई धर्म की सेवी , साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी
दोनों फूट-फूट के रोई , रुदन देख करुना भी रोई
संत लालजी हृदय पसीजा , हर दर्शक आंसू में भीजा
कहा सभी ने आप जइयो , आसुमल बोले की भाइयों
चालीस दिवस हुआ नही पूरा , अनुष्ठान है मेरा अधूरा
आसुमल ने छोडी तितिक्षा , माँ पत्नी ने की प्रतीक्षा
जिस दिन गाँव से हुई विदाई जार जार रोए लोग लुगाई
अहमदाबाद को हुए रवाना , मिया-गाँव से किया पयाना
मुम्बई गए गुरु की चाह , मिले वहीं पे लीलाशाह
परम पिता ने पुत्र को देखा , सूर्य ने घट जल में पेखा
घटक तोड़ जल जल में मिलाया , जल प्रकाश आकाश में छाया
निज स्वरूप का ज्ञान द्रढाया , ढाई दिवस होश न आया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्यान्ह ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार ॥
परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया , जीव गया और शिव को पाया
जान लिया हूँ शांत निरंजन , लागू मुझे न कोई बन्धन
यह जगत सारा है नश्वर , मैं ही शाश्वत एक अनश्वर
दीद है दो पर दृष्टि एक है , लघु गुरु में वही एक है
सर्वत्र एक किसे बतलाये , सर्व व्याप्त कहाँ आये जाये
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा , चले उसकी इच्छा अनुसारा
यदि वह संकल्प चलाये , मुर्दा भी जीवित हो जाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य रहे न शेष ।
मोह कभी न ठग सके , इच्छा नहीं लवलेश ॥
पूर्ण गुरु कृपा मिली , पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते , ब्रह्मानंद का आनंद लेते
खाते पीते मौन या कहते , ब्रह्मानंद मस्ती में रहते
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश , गृहस्थ साधु करो उपदेश
किये गुरु ने वारे न्यारे , गुजरात डीसा गाँव पधारे
मृत गाय दिया जीवन दाना , तब से लोगों ने पहचाना
द्वार पे कहते नारायण हरि , लेने जाते कभी मधुकरी
तब से वे सत्संग सुनाते , सभी आरती शांति पाते
जो आया उद्धार कर दिया , भक्त का बेडा पार कर दिया
कितने मरणासन्न जिलाए , व्यसन मांस और मद्य छुडाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दिन मन उकता गया , किया डीसा से कूच ।
आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूँक ॥
वे नारेश्वर धाम पधारे , जा पहुंचे नर्मदा किनारे
मीलों पीछे छोडा मंदिर , गए घोर जंगल के अन्दर
घने वृक्ष तले पत्थर पर , बैठे ध्यान निरंजन का धर
रात गयी प्रभात हो आई बाल रवि ने सूरत दिखाई
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता , छूटा ध्यान उठे तब संता
प्रातर्विधि निवृत हो आये , तब आभास क्षुधा का पाए
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा , यहीं बैठ कर अब खाऊँगा
जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि कर्ता खुद लाएगा
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये , त्यों ही दो किसान वहाँ आये
दोनों सिर पर बांधे साफा , खाद्य पेय लिए दोनों हाथा
बोले जीवन सफल है आज , अर्घ्य स्वीकारो महाराज
बोले संत और पे जाओ जो है तुम्हारा उसे खिलाओ
बोले किसान आपको देखा , स्वप्न में मार्ग रात को देखा
हमारा न कोई संत है दूजा , आओ गाँव करें तुमरी पूजा
आसाराम तब मन में धारे , निराकार आधार हमारे
पिया दूध थोडा फल खाया , नदी किनारे जोगी धाय
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गांधीनगर गुजरात में , है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का , यहीं है पावन धाम ॥
आत्मानंद में मस्त है , करे वेदान्ती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का , सदगुरु करते मेल ॥
साधिकाओं का अलग , आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा , जिसका नहीं बयान ॥
बालक वृद्ध और नर नारी , सभी प्रेरणा पाए भारी
एक बार जो दर्शन पाए , शांति का अनुभव हो जाये
नित्य विविध प्रयोग कराये , नादानुसंधान बताये
नाभि से वे ओम कहलायें , हृदय से वे राम कहलायें
सामान्य ध्यान जो लगाये , उन्हें वे गहरे में ले जायें
सबको निर्भय योग सिखाएं , सबका आत्मोत्थान करायें
हजारों के रोग मिटाए , और लाखों के शोक छुडाये
अमृतमय प्रसाद जब देते , भक्त का रोग शोक हर लेते
जिसने नाम का दान लिया है , गुरु अमृत का पान किया है
उनका योग क्षेम वे रखते , वे न तीन तापों से तपते
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते , आपद रोगों से बच जाते
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं , सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं
सचमुच गुरु हैं दीन दयाल , सहज ही कर देते हैं निहाल
वे चाहते सब झोली भर ले , निज आत्मा का दर्शन कर लें
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे , उनके सारे काज सरेंगे
गंगाराम शील है दासा , होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वराभयदाता सदगुरु , परम ही भक्त कृपाल ।
निश्चल प्रेम से जो भजे , साँई करे निहाल ॥
मन में नाम तेरा रहे , मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये , रहे चरण में प्रीत ॥
आरती श्री आसारामायण जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
कर दे प्रभु परायण जी की
एक एक शब्द पूर्ण है इनका
दोष मिटे जैसे अग्नि में तिनका
शांति और आनंद दात्री जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
सरल, सहज और मधुर है भाषा
पूर्ण करती हर अभिलाषा
कष्ट निवारक दुखहरनी की
आरती श्री आसारामायण जी की
ना कोई और है इनके जैसा
कंचन कार्ड पारस जैसा
भवतारक प्रिय है ये सभी की
आरती श्री आसारामायण जी की
पाठ करे जो निशिदिन इसका
पूर्ण करे जो काज हो जिसका
वर दानी कल्याणी जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
पद कर चडे निराली मस्ती
खो जाये प्राणी, मिट जाये हस्ती
ज्ञान भक्ति और योग त्रिवेणी
आरती श्री आसारामायण जी की
रामायण और गीता के सम
नहीं है ये किसी शास्त्र से कम
छोटी सी है पर बड़े लाभ की
आरती श्री आसारामायण जी की
जिसे पड़ कर गुरु याद बड़े है
विघन हटे जो राह में खडे है
विघन निवारक दुःख हरनी की
सुखकारी मंगलकरनी की
शिष्यों की हिरदय मलहारिणी जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
कर दे प्रभु परायण जी की
एक एक शब्द पूर्ण है इनका
दोष मिटे जैसे अग्नि में तिनका
शांति और आनंद दात्री जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
सरल, सहज और मधुर है भाषा
पूर्ण करती हर अभिलाषा
कष्ट निवारक दुखहरनी की
आरती श्री आसारामायण जी की
ना कोई और है इनके जैसा
कंचन कार्ड पारस जैसा
भवतारक प्रिय है ये सभी की
आरती श्री आसारामायण जी की
पाठ करे जो निशिदिन इसका
पूर्ण करे जो काज हो जिसका
वर दानी कल्याणी जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
पद कर चडे निराली मस्ती
खो जाये प्राणी, मिट जाये हस्ती
ज्ञान भक्ति और योग त्रिवेणी
आरती श्री आसारामायण जी की
रामायण और गीता के सम
नहीं है ये किसी शास्त्र से कम
छोटी सी है पर बड़े लाभ की
आरती श्री आसारामायण जी की
जिसे पड़ कर गुरु याद बड़े है
विघन हटे जो राह में खडे है
विघन निवारक दुःख हरनी की
सुखकारी मंगलकरनी की
शिष्यों की हिरदय मलहारिणी जी की
आरती श्री आसारामायण जी की
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सूरत नूरानी मन में बसी है
ऐसी छवि हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
मीरा और शबरी ने गुरु आज्ञा मानी
ज्ञानेश्वर जी ने भी गुरु महिमा जानी
ज्ञान बदते , मार्ग दिखाते .
रब की मूरत हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कितनों को तेरी भक्ति ने तारा
कितनों का तुमने जीवन सवारा
सांसो में बसते, धड़कन चलाते.
सृष्टि के कर्ता हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सच झूठे की हमको परख नहीं थी
राह सही थी न सोच सही थी
तुमने उबारा, हमको सवारा
सचे हितेषी तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
दूर हो तन से परख क्या पड़ता
द्रण निष्ठा से शिष्य आगे है बढता
सपनो में आते हो, अपना बनाते हो
हम सबके इश्वर हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
एकलव्य की थी निराली थी रीति
अद्भुत थी आरुणी, धुव की वो प्रीति
साची हो श्रद्दा , अटल भरोसा
हमको भी दे दो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कृपा के बदले में हम तुमको क्या दे हम
चरणों में खुद को ही अर्पण करे हम
ये उपकार करना, दिल में ही रहना
दूर न जाना तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
तुम बिन कोई न इच्छा रखे हम
जैसा भी चाहो वही करे हम
तुमको ही ध्याये, तुमको ही पाए
हम सबकी मंजिल तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
सूरत नूरानी मन में बसी है
ऐसी छवि हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
मीरा और शबरी ने गुरु आज्ञा मानी
ज्ञानेश्वर जी ने भी गुरु महिमा जानी
ज्ञान बदते , मार्ग दिखाते .
रब की मूरत हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कितनों को तेरी भक्ति ने तारा
कितनों का तुमने जीवन सवारा
सांसो में बसते, धड़कन चलाते.
सृष्टि के कर्ता हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सच झूठे की हमको परख नहीं थी
राह सही थी न सोच सही थी
तुमने उबारा, हमको सवारा
सचे हितेषी तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
दूर हो तन से परख क्या पड़ता
द्रण निष्ठा से शिष्य आगे है बढता
सपनो में आते हो, अपना बनाते हो
हम सबके इश्वर हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
एकलव्य की थी निराली थी रीति
अद्भुत थी आरुणी, धुव की वो प्रीति
साची हो श्रद्दा , अटल भरोसा
हमको भी दे दो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कृपा के बदले में हम तुमको क्या दे हम
चरणों में खुद को ही अर्पण करे हम
ये उपकार करना, दिल में ही रहना
दूर न जाना तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
तुम बिन कोई न इच्छा रखे हम
जैसा भी चाहो वही करे हम
तुमको ही ध्याये, तुमको ही पाए
हम सबकी मंजिल तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
सुरेश बापजी के स्वर में (मुझे लागी लगन गुरुचरन्न की)
मुझे गर्व न और सहारों का
बस तेरा सहारा काफी है .
बन बन के सहारे छुटते है
ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी
बस तेरा सहारा काफी है.
विशाखापतनम में सत्संग था बंगलादेश के एक सज्जन आये थे है तो अपने भारतीय एक अच्छी पोस्ट पर है ५५०००-६०००० मिलता है कह रहे थे की कुछ भी नहीं था बहार का लाभ हुआ पर अन्दर बड़ी शांति रहती है पहले कितना दुखी था कितना मानसिक रोग से दुखी था पर गुरुमंत्र का सहारा मिला गुरु का सहारा मिला बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए पहले जितना आकर्षण होता था
कोटा के एक सज्जन यहाँ आये होंगे शादीशुदा है उनका एक बच्चा है बोले मुझे हर नारी वैष्णोदेवी लगती है मेरी आख से गुरुदेव ने धोखे को हटा दिया गुरु की सीख रूपी सुरमे को जब से मैंने आख में लगाया . पहले वैष्णोदेवी जाता था कोटा से दो ढाई दिन लगते थे तब तक पानी भी नहीं पीता था विश्नोदेवी माता ने ही मुझे बापूजी तक पहुचाया अब बापूजी ने मुझे कितना उचा ऊठा दिया
पहले नजरो को धोखा होता था
नजरो को धोका देते है ये झूठे नज़ारे दुनिया के,
व्यक्ति का मन आकर्षण हो जाता है किसी का रूप देखकर ,किसी का घर , बड़ी गाड़ी देखकर, किसी का पद देखकर , किसी की प्रतिष्ठा देखकर ये गलत है
नजरो को धोखा देते है ये झूठे नज़ारे दुनिया के,
मेरी प्यासी नजरो के लिए बस तेरा नजर काफी है
बन बन के सहारे छुटते है ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी बस तेरा सहारा काफी है.
यहाँ इतनी संख्या में भक्त बैठे है इतनी भीड़ है किसलिए आये है केवल गुरुदेव के दर्शन करने के लिए उनके वचन सुनने के लिए जब तक बापूजी पधारे तब तक शांति से बैठे रहते है ये किसी और को सुनने के लिए या मुझे सुनने के लिए नहीं बापूजी अब आयेंगे अब आयेंगे एक चाह जेसे पहिहे को बरसात के कुछ नहीं लेना होता उसे तो स्वाती की एक बूंद से लेना होता है.
मेरी नजर में सवाल है, आपकी नजर का सवाल है
मेरी नजर में सवाल है, आपकी नजर का सवाल है
इशारा तेरी रहमत का मुझे एक बार मिल जाये मेरा उजड़ा हुआ चमन गुले गुलजार हो जाये.
पहिहे को मतलब ही क्या इन नदियों और तालाबों से 2
बादल से बरसती स्वाती की बस एक ही धारा काफी है 2
बन बन के सहारे छुटते है ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी बस तेरा सहारा काफी है.
आगरा के आश्रम में कार्यक्रम था एक महिला आई बोले मेरी बहन का बच्चा चल फिर नहीं सकता, वील कुर्सी पर है .आप आश्रम में रहते हो आप मेरी बापूजी से बात कर दो मैंने उनको कहा क्यों बोली ठीक हो जायेगा बापूजी आशीर्वाद देंगे. मैंने कहा की आशीर्वाद तो बरस ही रहा है अगर उनका आशीर्वाद नहीं होता तो आप आते ही नहीं माता जी आशीर्वाद है तभी आप आई हो बोले बात कर दो . मैंने कहा आप इस बच्चे को भगवन नाम की दीक्षा देते है वो दिलवा दो वो बोली ये निचे बैठ नहीं पायेगा मैंने कहा हम कुर्सी की व्यवस्था कर देते है ये दीक्षा दिलाओ ये जप करेगा . ब्रमज्ञानी महापुरुषों को कोई संप्रदाय नहीं चलाना होता उनको तो सबका भला करना होता है .
पटियाला से सिख बंधू आये थे मंजीत सिंह उनका नाम था उन्होने कहा मैंने सोनी टीवी पर बापूजी को देखा मुझे लगा की ये हमारे गुरुनानक जी है इसलिए मई दीक्षा लेने आया हूँ पर बापूजी उस दिन दीक्षा दे चुके थे. योगनुयोग पटियाला उनके पटियाला में ही गुरुदेव का सत्संग हुआ फिर उन्होने दीक्षा ली मुझे बहुत खुश होकर बता रहे थे.
उस बच्चे को दीक्षा दिलवा दी ढाई महीने में बाद वह महिला बहुत खुश होकर आई और कहा वो बच्चा अब चल फिर सकता है दीक्षा लेकर जप करने से उसके महापातक नष्ट हो गए
यहाँ रिश्वत और सिफारिश से कोई काम नहीं बन सकता है
बिगडी स्वर जाने में लिए बस तेरा सहारा काफी है .
बिगडी स्वर जाने में लिए एक तेरा इशारा काफी है .
हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ.
बस तेरा सहारा काफी है .
बन बन के सहारे छुटते है
ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी
बस तेरा सहारा काफी है.
विशाखापतनम में सत्संग था बंगलादेश के एक सज्जन आये थे है तो अपने भारतीय एक अच्छी पोस्ट पर है ५५०००-६०००० मिलता है कह रहे थे की कुछ भी नहीं था बहार का लाभ हुआ पर अन्दर बड़ी शांति रहती है पहले कितना दुखी था कितना मानसिक रोग से दुखी था पर गुरुमंत्र का सहारा मिला गुरु का सहारा मिला बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए पहले जितना आकर्षण होता था
कोटा के एक सज्जन यहाँ आये होंगे शादीशुदा है उनका एक बच्चा है बोले मुझे हर नारी वैष्णोदेवी लगती है मेरी आख से गुरुदेव ने धोखे को हटा दिया गुरु की सीख रूपी सुरमे को जब से मैंने आख में लगाया . पहले वैष्णोदेवी जाता था कोटा से दो ढाई दिन लगते थे तब तक पानी भी नहीं पीता था विश्नोदेवी माता ने ही मुझे बापूजी तक पहुचाया अब बापूजी ने मुझे कितना उचा ऊठा दिया
पहले नजरो को धोखा होता था
नजरो को धोका देते है ये झूठे नज़ारे दुनिया के,
व्यक्ति का मन आकर्षण हो जाता है किसी का रूप देखकर ,किसी का घर , बड़ी गाड़ी देखकर, किसी का पद देखकर , किसी की प्रतिष्ठा देखकर ये गलत है
नजरो को धोखा देते है ये झूठे नज़ारे दुनिया के,
मेरी प्यासी नजरो के लिए बस तेरा नजर काफी है
बन बन के सहारे छुटते है ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी बस तेरा सहारा काफी है.
यहाँ इतनी संख्या में भक्त बैठे है इतनी भीड़ है किसलिए आये है केवल गुरुदेव के दर्शन करने के लिए उनके वचन सुनने के लिए जब तक बापूजी पधारे तब तक शांति से बैठे रहते है ये किसी और को सुनने के लिए या मुझे सुनने के लिए नहीं बापूजी अब आयेंगे अब आयेंगे एक चाह जेसे पहिहे को बरसात के कुछ नहीं लेना होता उसे तो स्वाती की एक बूंद से लेना होता है.
मेरी नजर में सवाल है, आपकी नजर का सवाल है
मेरी नजर में सवाल है, आपकी नजर का सवाल है
इशारा तेरी रहमत का मुझे एक बार मिल जाये मेरा उजड़ा हुआ चमन गुले गुलजार हो जाये.
पहिहे को मतलब ही क्या इन नदियों और तालाबों से 2
बादल से बरसती स्वाती की बस एक ही धारा काफी है 2
बन बन के सहारे छुटते है ये रसम पुरानी है जग की
टूटे न कभी छूटे न कभी बस तेरा सहारा काफी है.
आगरा के आश्रम में कार्यक्रम था एक महिला आई बोले मेरी बहन का बच्चा चल फिर नहीं सकता, वील कुर्सी पर है .आप आश्रम में रहते हो आप मेरी बापूजी से बात कर दो मैंने उनको कहा क्यों बोली ठीक हो जायेगा बापूजी आशीर्वाद देंगे. मैंने कहा की आशीर्वाद तो बरस ही रहा है अगर उनका आशीर्वाद नहीं होता तो आप आते ही नहीं माता जी आशीर्वाद है तभी आप आई हो बोले बात कर दो . मैंने कहा आप इस बच्चे को भगवन नाम की दीक्षा देते है वो दिलवा दो वो बोली ये निचे बैठ नहीं पायेगा मैंने कहा हम कुर्सी की व्यवस्था कर देते है ये दीक्षा दिलाओ ये जप करेगा . ब्रमज्ञानी महापुरुषों को कोई संप्रदाय नहीं चलाना होता उनको तो सबका भला करना होता है .
पटियाला से सिख बंधू आये थे मंजीत सिंह उनका नाम था उन्होने कहा मैंने सोनी टीवी पर बापूजी को देखा मुझे लगा की ये हमारे गुरुनानक जी है इसलिए मई दीक्षा लेने आया हूँ पर बापूजी उस दिन दीक्षा दे चुके थे. योगनुयोग पटियाला उनके पटियाला में ही गुरुदेव का सत्संग हुआ फिर उन्होने दीक्षा ली मुझे बहुत खुश होकर बता रहे थे.
उस बच्चे को दीक्षा दिलवा दी ढाई महीने में बाद वह महिला बहुत खुश होकर आई और कहा वो बच्चा अब चल फिर सकता है दीक्षा लेकर जप करने से उसके महापातक नष्ट हो गए
यहाँ रिश्वत और सिफारिश से कोई काम नहीं बन सकता है
बिगडी स्वर जाने में लिए बस तेरा सहारा काफी है .
बिगडी स्वर जाने में लिए एक तेरा इशारा काफी है .
हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ हरी हरी ॐ.
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