Tuesday, July 1, 2008

ॐ : गुरू पूनम का पर्व है आया - भजन : ॐ

गुरू पूनम का पर्व है आया , झूम - झूम कर मन ने गाया ।
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥

साधक झूमें मस्ती में हरि नाम का जाम पिलाया ,
नाचे मनवा लहर - लहर गुरू नाम को तेरे गाया -२
प्यास बुझा जाओ , जल्दी से आ जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥

दूर रहो बच्चो से बापू अब ये सहा ना जाये ,
कितनी पीडा ना मिलने की ये भी कहा ना जाये -२
मिलन बढ़ा जाओ , "शुभ" दर्शन दे जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥

अंतर्यामी बापू ने वेदों का मनन कराया ,
लोभ मोह मद मत्सर के फंदो से हमे छुडाया -२
अमृत पिला जाओ , सत्संग सुना जाओ
गुरू जी मेरे आ जाओ , साई जी मेरे आ जाओ ॥

ॐ -: हे प्रभु आनंद दाता [प्रार्थना] :- ॐ

हे प्रभु आनंद दाता, ज्ञान हमको दीजिये
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये

लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................

निंदा किसीकी हम किसीसे भूल कर भी न करें
ईर्ष्या कभी भी हम किसीसे भूल कर भी न करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................

सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें
दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................

जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में
हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में
हे प्रभु आनंद दाता.................................

मातृभूमि मातृसेवा हो अधिक प्यारी हमें
देश की सेवा करें निज देश हितकारी बनें
हे प्रभु आनंद दाता.................................

कीजिये हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा ॐ
प्रेम से हम दुःखीजनों की नित्य सेवा करें
हे प्रभु आनंद दाता.................................

हनुमानचालीसा

॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥

हरि ॐ अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :

हरि ॐ
अहमदाबाद चेटीचंड शिविर (अप्रैल २००८) के मुख्य बिन्दु :

1. अनित्य में मन नहीं लगाकर नित्य की और बढ़ना शुरू करना चाहिए । समय तेज़ी से निकल रहा है ।
2. रोज संध्या का समय ६५ सेकंड के लिए आन्तरिक कुम्भक और ४० सेकंड के लिए वाह्य कुम्भक पक्का करो । ऐसे ७ प्राणायाम करें ।

3. गहरी श्वास अन्दर लेते समय सोचे की ईश्वरीय चैतन्य को अन्दर ले रहे है .... फिर श्वास रोके तो सोचें कि मैं प्रभु का और प्रभु मेरे, बस ...

और श्वास बाहर निकालते समय सोचें कि सारी पुरानी बातें और सारे निगेटिव विचार बाहर निकल रहे हैं . ऐसे रोजाना प्रयोग करें और ॐ कि धुन में ध्यान में बैठ जायें । ऐसा ४० दिन करें बहुत आध्यात्मिक उन्नति होगी।

4. पेट ख़राब रहता हो तो बाहरी कुम्भक में त्रिबंध लगाकर बैठकर पेट को अंदर-बाहर करिये और मन में रं रं रं जप करिये।

5. जो भी प्राणायाम करें उसे त्रिबंध लगाकर ही करें ।

6. श्वासों श्वास का ध्यान अनिवार्य ।

7. शिशंक आसन में रोज़ बैठना है । २ मिनट बडों के लिए और ३ मिनट स्टूडेंट्स के लिए । वज्र आसन में बैठकर जब सिर को ज़मीन पर लगाते हैं उसे "शिशंक" आसन कहते हैं ।

ध्यान दें : जब बाहरी कुम्भक करें तब वज्र आसन में बैठकर करें ।

8. इन दिनों बिना नमक के खाना सेहत के लिए अच्छा है ।

9. इन दिनों जप बढ़ा दे जब तक नवरात्र हैं ।

10. आंवला रोज़ खाने से आंते शुद्ध होती है । इन दिनों आंवला खाइए ।

11.श्रद्धा का जीवन में बहुत लाभ है । ये विश्व श्रद्धा से चल रहा है न की किसी और से । श्रद्धा बढाओ और भगवान में प्रीती ।

12. रोज़ सुबह उठकर थोडी देर भगवान से बातें करें और रात को सोने से पहले भी । पक्का नियम बना लें ।

Friday, May 23, 2008

Thursday, May 22, 2008

रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

बापू मेरा चाँद वर्गा
एस दी कृपा बड़ी निराली
वेख लें दे मथा टेक लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

बापू सदगुरु बनकर आया मैंने वेख लें दे.रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

बूटे बूटे पानी लावे
सूखे बुटे हरे बनावे
नि ओ माली बनकर आया मैनू वेख लें दे
मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


चिट्टा चिट्टा चोला पावे
सिर ते सोणी टोपी लावे
हाथ विच फुल्ला दा हार मैनू वेख लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

नाम दी उसने पयाऊ लगाई
हरी ॐ नाल दुनिया झुमाई
नाम दा अमृत मैंने पीके वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


बर्हमज्ञान दी महक पिलावे
जो कोई धयावे ओही तर जावे
बर्हम दा प्रेम स्वरूप मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


गुरु दा चरणी तीरथ तारे
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
आया तारणहारा मैनू वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


जिथे वी ओ चरण छुआवे
पत्थर दिल उतहे पिघल जावे
आया पार उतारन मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.


गुरुआ दी महिमा गायी न जावे
तिर्लोकी एत्हे झूम जाये
आया पर उतारन मैंने देख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.

Wednesday, May 7, 2008

श्री आसारामायण अनुष्ठान विधि



श्री आसारामायण अनुष्ठान विधि
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जहाँ पर अनुष्ठान करना हो, वहाँ ईशान कोण ( पूर्व व उत्तर के बीच की दिशा) में तुलसी का पौधा रखें । पाँच चीजों (गोमूत्र , हल्दी, कुमकुम, गंगाजल, शुद्ध इत्र या शुद्ध गुलाबजल) से पूर्व या उत्तर की दीवार पर समान लम्बाई - चौडाई का स्वस्तिक चिन्ह ( ) बनाये तथा उसके बाजू में पूज्य बापू जी की तस्वीर रख दें। फिर जमीन पर सफ़ेद या केसरी रंग का नया , पतला कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर गेहूँ के दानों से स्वस्तिक बना कर उस पर पानी का लोटा रख दें । लोटे के ऊपरी भाग में आम के पत्ते रखें व उन पर नारियल रख दें ।
उसके बाद तिलक करके ' ॐ गं गणपतये नमः ' मंत्र बोलते हुए , जिस उद्देश्य से अनुष्ठान करना है उसका संकल्प करें । फिर श्वास भरकर रोकें और महा मृत्युंजय मंत्र या गायत्री मंत्र का तीन बार जप करें तथा मन में संकल्प दोहराएँ कि 'मेरा अमुक कार्य अवश्य पूर्ण होगा ।' ऐसा तीन बार करें । अनुष्ठान जितने भि इदन में पूर्ण करना हो उनमें प्रत्येक सत्र (बैठक) में यह मंत्र व संकल्प दोहराना है । प्रतिदिन निश्चित संख्या में पाठ करें । अनुष्ठान के समय धुप करें तथा दीपक जलता रहे ।
अनुष्ठान की समाप्ति पर लोटे का जल तुलसी की जड़ में साल दें । गेहूँ के दाने पक्षियों के डालें , नारियल प्रसाद रूप में बाँट दें या बहती जल में प्रवाहित कर दें । गुरुमंत्र के जप से १०८ आहुतियाँ दे कर हवन कर लें तथा एक या तीन अथवा पाँच -सात कन्याओं को भोजन करायें । दृढ श्रद्धा -विश्वास , संयम तथा तत्परता पूर्वक इस विधि से अनुष्ठान करने वालो की मनोकामना पूर्ण होने में मदद मिलती है ।

(स्वामी सुरेशानंद जी के प्रवचन से ) - लोक कल्याण सेतु : अंक १२६ । १६ दिसम्बर २००७ से १५ जनवरी २००८