युवा तन को भूल मत जो चाहे कल्याण
नारायण इस मौत को दूजो श्री भगवान
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
साथ देती नहीं ये किसी का
श्वास रुक जायेगी चलते चलते
शमा बुझ जायेगी जलते जलते
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
चार दिन की मिली जिंदगानी हमें
चार दिन में ही करनी मुलाकात है
राख बनकर के एक दिन तो उड़ जायेंगे
उससे पहले तो हरि से मिलना तो है
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
कोई तेरा नहीं सब है धोखा यहाँ
काहे जीवन को यू ही गवाता है तू
राम को भूल बैठा है जिनके लिए
चार दिन में ही तुझको भुला देंगे वो
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
लेके कंधे पर तुझको चले जायेंगे
तेरे अपने ही तुझको जला आयेंगे
चार दिन के मुसाफिर तू सो क्यों रहा
अब तो मोहब्बत कर ले मेरे राम से
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
तुलसी मीरा के जैसे तो है हम नहीं
शबरी की जैसी भक्ति भी हममे नहीं
फिर भी तेरे ही बालक है हम राम जी
हमको अपनी शरण में ले लो राम जी
क्या भरोसा है इस जिन्दगी का
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Sunday, February 10, 2008
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